अपनों से कहनी हें बातें

સામાન્ય

अपनों से कहनी हें बातें

आगसे लिपटी हें ये बातें

रोते मनकी हें ये बातें

हृदय जलाती हें ये बातें

 

भाव पूर्ण हृदय धबके थे

स्वार्पण कर कइं देह मीटे थे

ललनाके लालित्य यहां पर

ध्येय पुर्तिमें राख बने थे

 

पत्थर से संगीत प्रगटाया

जल कंपन से नृत्य उठाया

निसर्गसे छलके गीतोंसे

वेद मंत्रका रव प्रगटाया

 

एक हृदय थे एक जीवन थे

सुख दु:ख को सबने बांटे थे

विवाद की कोई बात नहीं थी

हृदय हृदय संवाद चले थे

 

अब तडपन हें कुछ बननेकी

अब तडपन हें पा लेनेकी

जिह्वा अब तलवार बनी है

हृदय गुहा अब कैद बनी है

 

स्वार्थ पूर्ण है जीवन सबका

पशुता का तांडव है बहका

मानवता कुट कुट रोती है

छलना मुख मुख पर हसती है

 

प्रथम गुरु थे ये वसुधा पर

वैचारीक सर्जन के सर्जक

नहीं क्षमता अब शिष्यकी हममें

सिर्फ़ नकलके हम है पुजक

 

गीता में संगीत नहीं क्युं ?

वेद विवाद बने है अब क्युं ?

क्युं भारतकी गरीमा काली ?

क्युं अपनी मंझील अंधियारी?

 

युवक हृदय क्रांतिस्थल होंगे

चंचल मन जब निश्रच्ल होंगे

ध्येय पुर्ति में अविचल होंगे

धर्म कलश तब झिलमिल होंगे ।

============ॐ ============

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