भुली संस्कृति को तुने फीर उठाया

સામાન્ય

(राग – धरा को उठाया गगनको झुकाया . . . )

 

भुली संस्कृति को तुने फीर उठाया

गहनसे गहनको सरलतम बनाया . . .

 

जीवन मौतके हाथमें पल रहा था

तुने मौतमें भी जिवनको नचाया

हुआ ज्ञान कैदी था पंडित के सरमें

तुने ज्ञान गंगाको घर घर बहाया . . . १

 

चिता बनके  चिंता तो दिल में जली थी

तुने भाव निर्झर का अमृत बहाया

हुए मुक्त तन से गुलामी मीटाकर

दिमागी गुलामी को तुने मिटाया . . . २

 

जीवन रो रहा था ये बनकर के खंडर

तूने भस्म से भव्यको है सृजााया

सभी के जिवनसे हंसी चल बसी थी

हंसी बन सभीके तुं  चहेरे पे छाया . . . ३

 

बिना लंगरोंकी भटकती जवानी

तुने नाखुदा बनके मंजिल लगाया

आंखो से लाचारी बलखा रही थी

तुने अस्मिताकी किरण को उगाया . . . ४

 

सकल शास्त्र मिलकर तुम्हीं में समाये

तुने शास्त्र को जिंदगी मे मिलाया

भूले धर्म हम थे गलत धर्म छाया

तुने धर्म के मर्म को है बताया . . . ५

=================ॐ===================

पोष वद एकादशी सं. २०३५ बुधवार ता. २४-१-७९

Advertisements

પ્રતિસાદ આપો

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / બદલો )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / બદલો )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / બદલો )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / બદલો )

Connecting to %s