क्योंकी ‘दादा’ने भरदी है, योगेश्वरकी छाया |

સામાન્ય

हरीयाली दिलमें  छाई है, पुलकित हो गई काया;

क्योंकी ‘दादा’ने भरदी है, योगेश्वरकी छाया |

 

स्वार्थका भोजन द्वेष का पानी, उससे जीवन चलता;

तर्क वितर्क विवाद वाद में, समय हमारा कटता;

राम किया था कैद हृदय में, उसको तुने छुडाया;         क्योंकी . . .

 

रक्त बहाया भाई भाई ने, पिता पुत्र भी लडते;

पति पत्नी में मेल नहीं है, बच्चे मां से बिछडते;

चमन उजाडा हमने मिलकर, तुने उसे खिलाया;         क्योंकी . . .

 

प्रभुके मंदिर नहीं मिलते है, जन मंदिर दिखते है;

नाम लिखा है बाहर खूद का; प्रभु अंदर रोते है;

ईश्वरका व्यापार चलाया, तुने उसे मीटाया             क्योंकी . . .

 

मेंडक ने संगीत छेडा है, कोयल मौन हुई है;

मोर भूले है नाच नाचना, गर्दभ मत बने है;

जूठी बात मिटाकर जगसे, सच्ची राह बताया;            क्योंकी . . .

 

हरियाणा में हरि बसाकर, घर घर को नचाया;

कुरुक्षेत्र का तीर्थ बनाकर, पांचजन्य गहकाया;

सभी भेदका छेद उडाकर, मानव कुल बनाया;        क्योंकी . . .

=== ॐ ===

कार्तिक षष्ठि, सं. २०३६, शुक्रवार. दि. २६-१०-७९.

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