अभिलाषा है बस ये दिलमें|

સામાન્ય

अभिलाषा है बस ये दिलमें,

एक छोटासा संसार बसे |

 

    एक नन्हा सा खुदका घर हो,

    आंगन में सुंदर उपवन हो,

    पुष्पों पर मधुकर गुंजन हो|

 

तब रूप रंग माधुर्य सभर,

जीवन के मधुरम गान उठे. . .              अभिलाषा. . .

 

    पंछी के गीत की चहचाहट,

    बालक के हसने की आहट,

    वात्सल्य सभर चुंबन चाहत|

 

तब चिंतित मन पुलकित बनकर,

ह्रदय से स्नेह सरीत बहदे. . .              अभिलाषा. . .

 

    सौंदर्य सजा भार्या आनन,

    है प्रेम सभर उसका दामन,

    मीठी बानी करती पावन|

 

दु:ख दर्द तभी पूरे जलकर,

अनुपम शांति के स्रोत बहे. . .              अभिलाषा. . .

 

    सन्मित्र जीवन का अंग बने,

    सच्चे वैभव का संग बने,

    आतिथ्य भाव जीवंत बने |

 

आनंदीत पुलकीत केतन में,

पावित्र्य सदा बहता ही रहे. . .              अभिलाषा. . .

 

    ईंश प्रेम बिना सब व्यर्थ ही है,

    और ध्येय बिना कुछ अर्थ न है,

    पशुता तो सिर्फ अनर्थ ही है |

 

प्रभुके गीत गुंजन से छलका,

दैवी संसार बनाना है. . .                    अभिलाषा. . .

    ===ॐ===

फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्थी, शनिवार, सं. २०३८. दि. १३-३-८२.

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