ॐकार

સામાન્ય

ॐकार खूब हर्षित होकर भैरव गाते है,

क्योंकी स्वाध्यायी अब यात्रा करने आयें है |

 

    भाव गंगा मस्तकसे बहती,

    कर्मधार रेवा है बनती,

ज्ञान, कर्म भक्ति की दीक्षा शिवजी देते है. . .                           ॐ कार. . .

 

    नाग लपाये कंठमें जाकर,

    शिव खेलत है कालसे हंस कर,

मृत्यु से अमृत के पथ पर शंकर लाते है. . .                            ॐ कार. . .

 

    धर्म संस्कृतिके जो भक्षक,

    डंसते है बनकर वे तक्षक,

पंचानन एसे दानवका मर्दन करते है. . .                                 ॐ कार. . .

 

    ईश चरणों में जीवन देते,

    पर जगसे वे कुछ नहीं लेते,

एसे कर्मवीरोंको शंभु शीश पर धरते है. . .                               ॐ कार. . .

 

    भाल में सोहे ज्ञानका लोचन,

    करता है वह पाप विमोचन,

स्वाध्यायी अपने पापोंकी कहने आये है. . .                            ॐ कार. . .

 

    पांडुरंग के तप का प्रसरण,

    कलियुग में सतयुगका प्रकटन,

सच्ची यात्रा देख पिनाकीन थै थै नाचे है. . .                            ॐ कार. . .   

==== ॐ ====

महा शुक्ल पक्ष सप्तमी, सं. २०४०, गुरुवार. दि. ९-२-८४ – ईंदौर (मध्य प्रदेश)

(यह गीत ॐकारेश्वर तीर्थयात्रा के उपलक्ष्य में, ८-२-८४ बुधवार को वडोदरा में लिखना शुरु कीया और ईंदौर में दि. ९-२-८४ सुबह ६:५५ को पूरा कीया|)

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