आनंद उर न समाय।

સામાન્ય

हाँ री मोहे आनंद उर न समाय,

हाँ  री हाँ  री आनंद उर न समाय,

आनंद घन है ऐसो बरस्यो,

शीश से पैर नहाय. . . हाँ  री हाँ  री. . .

 

“आनंद बाजा बाजे गगन में” रंगोक्ति समजाय,

मन की कोकिल दिल में गुंजे, उर्मि मधुकर गाय. . .     हाँ  री. . .

 

सुख के मृगजल पी के मानव दु:ख की छाँव में जाय,

मैं आनंद मगन हो नाचु लोग दीवाना कहाय. . .           हाँ  री. . .

 

जन्म मरन का उर नाही मोहे सघरा द्वैत मिटाय,

मैं हुं ईश में  ईश है मुझ में अद्वैतामृत पाय. . .            हाँ  री. . .

 

सगे संबंधी सब रिश्तों के बंधन तूट तूट जाय,

हरि के साथ है नाता जोडा स्वयं हरि को जाउँ. . .        हाँ  री. . .

 

सत्य स्वरूप हरि प्रकाशमय है आनंद उर छलकाय,

जीव मिटा अब शिव स्वरूप मैं ईश्वर रूप सुहाय. . .    हाँ  री. . .

=== ॐ ===

अश्विन शूक्ल चतुर्थी (नवरात्री), संवत २०६९, मंगलवार। दि. ८ – १० – २०१३।

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