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आनंद उर न समाय।

સામાન્ય

हाँ री मोहे आनंद उर न समाय,

हाँ  री हाँ  री आनंद उर न समाय,

आनंद घन है ऐसो बरस्यो,

शीश से पैर नहाय. . . हाँ  री हाँ  री. . .

 

“आनंद बाजा बाजे गगन में” रंगोक्ति समजाय,

मन की कोकिल दिल में गुंजे, उर्मि मधुकर गाय. . .     हाँ  री. . .

 

सुख के मृगजल पी के मानव दु:ख की छाँव में जाय,

मैं आनंद मगन हो नाचु लोग दीवाना कहाय. . .           हाँ  री. . .

 

जन्म मरन का उर नाही मोहे सघरा द्वैत मिटाय,

मैं हुं ईश में  ईश है मुझ में अद्वैतामृत पाय. . .            हाँ  री. . .

 

सगे संबंधी सब रिश्तों के बंधन तूट तूट जाय,

हरि के साथ है नाता जोडा स्वयं हरि को जाउँ. . .        हाँ  री. . .

 

सत्य स्वरूप हरि प्रकाशमय है आनंद उर छलकाय,

जीव मिटा अब शिव स्वरूप मैं ईश्वर रूप सुहाय. . .    हाँ  री. . .

=== ॐ ===

अश्विन शूक्ल चतुर्थी (नवरात्री), संवत २०६९, मंगलवार। दि. ८ – १० – २०१३।

कन्हाईको नयनन नींद न आवे

સામાન્ય

(राग – झुलो झुलो रे दत्तदिगंबर स्वामी…)

 

कन्हाईको नयनन नींद न आवे,

मैया पलनमें झूलावे. . .

मीठी रागीनीसे गीत अनुठे गावे,

मैया लालनको सुलावे. . .

 

दधी मंथन घोष हुआ था, कान्हा भी तबसे जगा था।

पैंजनिया झमकाता था, आंगनमें खुब खेला था।

खुब थक कर वो, जशोदा अंक सीधावे. . .

मैया लालनको सुलावे. . .

 

गोपीके घरमें गया था, महीं मख्खन स्वाद जचा था।

पानेलो नाच कीया था, थोडा मख्खन ही मिला था।

रोते रोते वो, यशोमति गोदमें जावे. . .

मैया लालनको सुलावे. . .

 

पंछीकी छांव पकडने, बछडेकी तरह दौडा था।

गैया चारनकी खातिर, गोपोका भेस सजा था।

कान्हाकी वो, बाल सहज लीलायें. . .

व्रज जनमनको ललचायें. . .

 

सुंदर तन मन कान्हा का, मधुरा है स्नेह हृदयका,

मीठी बानी मन हर्ता, जमुना जल सम निर्मलता।

सुखदायी वे, बालकथा मन भावे. . .

जन्मोंके पाप मिटावे. . .

=== ॐ ===

आओं सैर करे उपवनमें।

સામાન્ય

आओं सैर करे उपवनमें।

एक नये मधुबनमें,

आओं सैर करे उपवनमें।

 

उत्कंठाके बीज बोये हैं,

विचार द्रुमके झुंड झुमे है,

कुतुहलताके पुष्प हृदयसे,

चिंतन गुंजन सुने।              एक. . .

 

पत्थरसा मस्तिष्क बना है,

बर्फीला जड हृदय हुआ है,

आलिंगन उष्माका देकर,

स्नेह जीवन रस जाने।        एक. . .

 

ईर्ष्याकी मधुमक्खी चूभे,

स्नेह सभर मधुकर दिल चुमे,

फिरभी पुष्प खिले मुसकाये,

नाच रहे काननमें।              एक. . .

 

जुगनुके दिपक प्रकटे हैं,

ओस बूंदके स्त्रोत बहे हैं,

युग युगके प्यासे चातक मन,

आओ प्यास बुझाने।           एक. . .

=== ॐ ===

पोष कृष्ण चोथ, सं. २०४७, शुक्रवार। दि. ४-१-१९९१।