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आनंद उर न समाय।

સામાન્ય

हाँ री मोहे आनंद उर न समाय,

हाँ  री हाँ  री आनंद उर न समाय,

आनंद घन है ऐसो बरस्यो,

शीश से पैर नहाय. . . हाँ  री हाँ  री. . .

 

“आनंद बाजा बाजे गगन में” रंगोक्ति समजाय,

मन की कोकिल दिल में गुंजे, उर्मि मधुकर गाय. . .     हाँ  री. . .

 

सुख के मृगजल पी के मानव दु:ख की छाँव में जाय,

मैं आनंद मगन हो नाचु लोग दीवाना कहाय. . .           हाँ  री. . .

 

जन्म मरन का उर नाही मोहे सघरा द्वैत मिटाय,

मैं हुं ईश में  ईश है मुझ में अद्वैतामृत पाय. . .            हाँ  री. . .

 

सगे संबंधी सब रिश्तों के बंधन तूट तूट जाय,

हरि के साथ है नाता जोडा स्वयं हरि को जाउँ. . .        हाँ  री. . .

 

सत्य स्वरूप हरि प्रकाशमय है आनंद उर छलकाय,

जीव मिटा अब शिव स्वरूप मैं ईश्वर रूप सुहाय. . .    हाँ  री. . .

=== ॐ ===

अश्विन शूक्ल चतुर्थी (नवरात्री), संवत २०६९, मंगलवार। दि. ८ – १० – २०१३।

जय जय जय गुरुदेव।

સામાન્ય

जय चिन्मय स्वामी गुरु जय चिन्मय स्वामी,

आदि शंकर पथ के (२) आप अनुगामी…               जय चिन्मय…

 

मोहमयी नगरीमें त्याग जीवन शिक्षा… गुरु त्याग…

शिक्षित यौवनको दी (२) संन्यासी दिक्षा…             जय चिन्मय…

 

ईच्छा यह सब स्थलमें, धर्म प्रवर्तन हो… गुरु धर्म…

ज्ञान पूर्ण संन्यासी (२) स्थान नियामक हो…         जय चिन्मय…

 

गहन धर्म सूत्रोको सरल मधुर करते… गुरु सरल…

वेद गीता उपनिषद (२) सहज साध्य रमते…           जय चिन्मय…

 

तर्क स्नेह मिश्रणसे, धर्म तत्व कहते… गुरु धर्म…

बुद्धि हृदय स्पंदन को (२) मुखरीत है करते…         जय चिन्मय…

 

वाणीमें है गर्जन, हास्य कटाक्ष भरे… गुरु हास्य…

शुष्क हृदय पुलकित कर (२), तत्व रहस्य भरे…     जय चिन्मय…

 

देश विदेश घूमे तुम, धर्म ध्व्जा लेकर…गुरु धर्म…

तप्त जीवनको लगते (२) आप्त और सुखकर…        जय चिन्मय…

 

ज्ञान यज्ञसे गीता जनमन को भायी… गुरु जनमन…

बाल युवक वृद्धो को (२) लगती है भाई…                जय चिन्मय…

 

नमस्कार चरणोमें आप स्वीकार करे… गुरु आप…

पाप पंख को धो कर (२) मोक्ष प्रदान करे…             जय चिन्मय…

=== ॐ ===

श्रावण शुक्ल पक्ष छठ, सं. २०५०, शुक्रवार। दि. १२-८-१९९४।

पांडुरंग है आएं।

સામાન્ય

मन मधुकर क्युं गीत गाएं?

पांडुरंग है आएं।

 

सरल कथन है, गहन मनन है,

भाव नयन है, मधुर कवन है,

वनमाली वनसे आएं।                    पांडुरंग . . .

 

धर्म धेनुका गोरस लाएं,

जीवनमें सबरस बन आएं,

दिलमें उत्सव बन छाएं ।                पांडुरंग . . .

 

कवि काव्यका रूपक तुम हो,

संगीतमें स्वर धडकनभी हो,

हैं सामवेद बन आएं।                     पांडुरंग . . .

 

कंठ कंठमें एक ही सुर हैं,

एक ही रंगमें सब चकचूर हैं,

हैं स्नेह सुमन मुस्काएं।                  पांडुरंग . . .

=== ॐ ===